उत्तराखंड 9 नंवबर को 25वां स्थापना दिवस मना रहा है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि राज्य ने बीते 24 वर्षों में क्या कुछ हासिल किया है. सूबे में नए जिलों की मांग और वादे पिछले एक दशक से अधिक समय से चर्चा का केंद्र बने हुए हैं.
रमेश पोखरियाल निशंक की घोषणा के तुरंत बाद काशीपुर को भी नया जिला बनाने की मांग तेज हो गई. उधम सिंह नगर जिले के इस शहर ने इस मांग के लिए जन आंदोलन तक शुरू किया था. जनता की मांग को देखते हुए, निशंक ने काशीपुर को नए जिले के रूप में मान्यता देने की सहमति भी दी.
2012 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद, विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने. उन्होंने अपने कार्यकाल में जिलों के पुनर्गठन के लिए एक आयोग का गठन किया, लेकिन इस आयोग से नए जिलों की दिशा में ठोस कदम आगे नहीं बढ़ पाए. यह फैसला भी जनता की उम्मीदों को साकार करने में असफल रहा.
उत्तराखंड के नए जिलों का मुद्दा राजनीति का मुख्य हथियार बनता गया. कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सत्ता में आने के बाद 5 की जगह 9 नए जिलों की घोषणा कर दी. उन्होंने इस योजना के लिए 100 करोड़ रुपए का बजट भी निर्धारित किया, लेकिन जिलों के गठन का सपना धरातल पर उतारने में यह राशि भी नाकाफी साबित हुई.
लोकल18 ने वरिष्ठ पत्रकार एस.एम.ए. काज़मी से इस मुद्दे को लेकर बातचीत की. उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 में जब उत्तराखंड राज्य बना तो उसके पीछे कई स्थानीय मांगे थी. नए ज़िलों की मांग हर बार उठती रही है. सूबे के तमाम पूर्व मुख्यमंत्रियों ने इसको लेकर कई घोषणाएं की.
उत्तराखंड में नए जिलों का गठन राज्य स्थापना के बाद से ही एक लंबित मुद्दा रहा है. चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस की, हर चुनाव से पहले यह मुद्दा उभर कर आता है. बार-बार की घोषणाओं के बावजूद भी यह सपना अब तक अधूरा है.